Sep 15, 2008

दे िटप्पणी के नाम,तुझको अल्ला रखे

भाई उड़नतश्तरी हर डाल पर बैठे नजर अाते हैं
दे िटप्पणी के नाम,तुझको अल्ला रखे। हजार शब्द िलखते हैं,चार लाइना मेरे नाम िलखे। जो देता है,वह पाता है। मुझे िटप्पणी भेजे, बदले में मेरी पाये। भाई दोनों हाथ से ताली बजती है,एक हाथ मेरा-दूसरा अापका िमल जाये,तो िफर देखे कैसी गूंज होती है।हमारा ब्लॉग िफल्मों की तरह िहट हो जायेगा। चैनलों की तरह टीअारपी चढ़ जायेगी। बछड़ें की मािफक ब्लॉग का सरकुलेशन कुलांचे भरने लगेगा।िवगयापन वाले अपनी देहरी पर मत्था टेंकने लगेंगे। हमारी-अापकी बल्ले-बल्ले हो जायेगी।मेरे कई ब्लॉगर साथी इस मिहमा को पहचान गयें हैं। िमतरों-पिरिचतों से ब्लॉग देखने और िटप्पणी देने का अनुरोध िबना लजाये करते रहते हैं। वैसे ही जैसे एक िफल्म का नायक कटोरा िलए मांगता था,दे दाता के नाम....
मैं जबसे ब्लािगस्ट बना हूं,अपना देखने के अलावा दूसरों का भी देखता हूं। भाई उड़नतश्तरी हर डाल पर बैठे नजर अाते हैं।मोहतरमा शोभा जी भी उनके साथ गुटरगूं करती नजर अाती हैं। इन दोनों को ब्लािगस्टों की हौसला अफजाई के िलए पऱणाम।िटप्पणी की डाल पर इनके अलावा कुछ और नाम अक्सर टंगे िमलते हैं। यहां तक तो ठीक है,लेिकन ये शब्दों को लेकर इतने कंजूस हैं िक बधाई हो,अच्छा िलख रहे हैं,स्वागत है से ज्यादा कुछ नहीं िलखते। लगता है िक ये अालेख नहीं पढ़ते,बस जैसे ही कोई नया ब्लॉगर अाता है ये पहले से टाइप िटप्पणी उस पर िचपका देते हैं।
बहरहाल,मुझे ब्लाग पर अाये महीना से ऊपर होने को है। खेल-खेल में अा गया था। फुरसत में नाम के अपने ब्लॉग पर फुरसत में कुछ-कुछ िलखने लगा। िफट्जी से पता चला िक देश-िवदेश में लोग पढ़ रहे हैं। मैं गंभीर हो गया। जब इतने लोग पढ़ रहे हैं,तो कुछ भी िलखने से बेहतर है िक कुछ अलग िलखा जाये।इसके िलए एक नया ब्लॉग डाकघर शुरू िकया। यह िबहार-झारखंड के नक्सिलयों से जुड़ा है। बतौर पतरकार मैं इनसे जुड़ा रहा हूं और इनकी खुिबयों-खािमयों का गवाह भी रहा हूं।यही अनुभव िसलिसलेवार िलख रहा हूं।ब्लॉग फुरसत में, में मैं वैसी चीजों को शािमल करता हूं,जो पटना से जुड़ी मेरी यादों में है । वहीं नेता और अिभनेता का फकॆ िमटा देनेवाले लालू पऱसाद यादव से िविभन्न मसलों पर अॉफ दी िरकाडॆ इंटरव्यू के बहानेे वैसी चीजों पर केंदिरत हूं,जो छपने और िदखाने पर लालू जैसे अगंभीर व्यिक्त भी गंभीर हो जाये।
अब यही फुल स्टॉप लगाता हूं। इस अनुरोध के साथ िक िबना मेरे अालेख को पढ़े अापकी िटप्पणी मुझे नहीं चािहए।

Sep 10, 2008

उ गुरुजी हैं,तो हम गुरुघंटाल

िबहार में बाढ़ अाने के कारण लालू पऱसाद इधर व्यस्त चल रहे थे। कभी नीतीश पर िनशाना साध रहे थे,तो कभी सरकारी तंतर को अाड़े हाथों ले रहे थे। बाढ़ इलाके का हवाई नजारा लेकर पटना लौटे थे। झारखंड की गद्दी पर दिढ़यल बाबा िशबू सोरेन को बैठाने के बाद उनका इंटरव्यू लेने के िलए मैं बेताब था। मौका िमला,तो वे िफर अॉफ दी िरकाडॆ बात करने की िजद पर अड़ गये। बोले-कहता कुछ हूं,िलखा कुछ और जाता है। सवाल इतना अटपटा पूछा जाता है िक मुंह से भी लटपट िनकल जाता है। खैर हमारा पहला सवाल था...
सवालः झारखंड के मुख्यमंतरी कोड़ा को अभयदान देने के पांचवे िदन ही उन्हें गद्दी से काहे उतरवा िदये?
जवाबः अरे भाई का कहे,इ िशबू सोरेन बड़का गुरु बनते हैं। इसीिलए कह िदया था िक खुदे सीएम कुसीॆ के सवाल का जवाब खोजे। कोड़ा के पीठ पर हम जइसे ही हाथ धरे िक िदल्ली में हमरा घर अगोरे लगे।
सवालः क्या कह रहे थे?
जवाबः का कहेंगे। एक बार कइसहूं सीएम बनाने की गुहार लगा रहे थे।
सवालः और अाप मान गये?
जवाबः गुरुजी बुढ़ा गये हैं। कोटॆ-कचहरी के चक्कर में फंसे हुए हैं। जेल िरटनॆ हैं। सरदार जी की कुसीॆ बचाने में सहयोग िकये थे,इसीिलए सोचे िक इनको भी एक कुसीॆ िदया जाये।
सवालः कोड़ा भी तो मनमोहन सरकार बचाने में जुटे थे?
जवाबः यूपीए में रहके का करते?िबना हरेॆ-िफटकरी के उनका मामला चोखा था। िनदॆल होकर भी दो साल सीएम रहे और क्या चािहए था उनको।
सवालः इस मसले पर बार-बार अापका बयान क्यों बदल रहा था।
जवाबः बयान नहीं पैतरा बदल रहे थे। अखाड़ा में िवरोधी के दांव का काट तो रखना पड़ता है न।
सवालः कोड़ा और िनदॆलीय मंतिरयों को कैसे काबू में िकये।
जवाबः सब पावर में बने रहे इसीिलए अटर-पटर बोल रहा था। जइसे ही पक्का हुअा की कोड़ा को छोड़ िकसी की कुसी नहीं जायेगी,ऊ सब कोड़ा को को ही छोड़ िदया।
सवालः कहा तो यह जा रहा था िक अपही सब डील िकये?
जवाबः यह कोई परमाणु डील था का? सबको पावर चािहए था वह जइसे ही पक्का हुअा सब गरजना छोड़ िमिमयाने लगा।
सवालः गुरुजी को कुछ िटप्स िदये की नहीं?
जवाबः उनको पता है िक वे गुरुजी हैं,तो हम गुरुघंटाल हैं। एने-अोने कुछ करेंगे,तो हमको गरदिनयाने भी अाता है।
सवालः अापका पाटीॆवाला लोग भी बोडॆ अािद में चेयरमैनी के िलए मुंह िपजाये हुए हैं?
जवाबः हक तो उनका बनता है, बाकी इस माहौल में इससे फजीहते जादा होगा।
सवालः वह कैसे।
जवाबः अब हम इसपर जादा नहीं बोलेंगे। बस इतना कहेंगे िक काजल की कोठरी है वह। दाग लगेगा और सब हमरा पर अटैक करेगा।

अगला इंटरव्यू िबहार के बाढ़ पर जल्द ही


Aug 20, 2008

मुफ्त में हंिसये और टनाटन रिहये

लालू बोले-इ बाबा रामदेव का दवाई है
लालू यादव अाज टेंशन में नहीं लग रहे थे। लोग उन्हें घेर रखे थे और वे कुछ एेसा-वैसा बोल रहे थे,िजससे लोग लगातार हंसे जा रहे थे। मुझे देख बोले-इ बाबा रामदेव का दवाई है। फऱी में हंिसये और टनाटन रिहये। मैं भी हंसा और लालू के साथ अपने इंटरव्यू को अागे बढ़ाने के िलए मौका देखने लगा। वे समझ गये। कहा-हमेशा हड़बड़ी में रहते हो। अाराम से बइठते हैं,बातचीत भी होगी और साथ में पेट पूजा भी करते रहेंगे। कुछ देर बाद वह मौका िमला। अॉफ दी िरकाडॆ की शतॆ के साथ मैं शुरू हो गया।
सवालः अाज अाप मूड में दीख रहे हैं,कोई िवशेष बात है क्या?
जवाबः वैसा कुछ नहीं है,बाकी हमरा जगह अब सुशासन बाबू (नीतीश कुमार)टेंशन में हैं। हमको और राबड़ी को १५ साल तक गिरयाया और अब देखो सुशासन में पटना का जल और मल एके में िमल गया है। हाइकोटॆ जब बोला िक पटना कूड़े के ढेर पर है,तो उसका मंतरी कोटॆ को ही अटपट बोलने लगा। नीतीश अब अकबकी में मंतरी को समझा रहे हैं िक कोटॆ को नहीं बोला जाता है खाली सुना जाता है।
सवालः वाइफ से टेंशन के बारे में खुल कर नहीं बताये?
जवाबः देखो भाई हम तो सब के बारे में सोचते हैं। शुरुअात घरे से करते हैं। राबड़ी को चौका बरतन छुड़वाकर मुख्यमंतरी बनवाया। उनका दो गो भाई को िवधायक सांसद बनवाया। का नहीं िकया। िवरोधी सब का-का नहीं बोला,बाकी हम टस से मस नहीं हुए। अपने गांव से ससुराल को रेल लाइन से जोड़ा। केतना िगनाये। अब राबड़ी हड़बड़ी में हैं िक साहब िफर से सीएम की कुसीॆ जल्दी जोगािड़ये। यही टेंशन है।
सवालः इसके िलए क्या कर रहे हैं?
जवाबः हड़बड़ाने से कुछो िमलता है? हमहूं तो पीएम बनना चाहते हैं,तो उसके िलए राह-रस्ता न बनाना पड़ता है। रामिवलास को धीरे-धीरे पोिटया रहे हैं। अभी एक मंच पर उठना-बैठना शुरू हुअा है। नीतीश के िखलाफ मोरचा खोलना है। पुराना लोग को िफर से जोड़ना है। उसके बाद हल्ला बोलेंगे।
सवालः लेिकन रामिवलास तो अकेले चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं?
जवाबः अकेला चना भाड़ नहीं फोरता,यह उनको समझ में अा गया है। पोलिटक्स है,अादमी कुछो-कुछो बोलता रहता है। ज्यादा ध्यान देने पर इहो कवनो कम टेंशन नहीं देता।
सवालः नीतीश भी तो कभी अापके साथ थे?
जवाबः हां,थे न। जब देखा िक यहां सीएम बनने का चांस नहीं है,तो अटपट बोल मूड़ीकटवा पाटीॆवाला के साथ हो िलये। बुढ़ऊ जाजॆ को भी पट्टी पढ़ाकर अपना खेमा में कर िलया। अब देखो उनको कइसे दूध के माछी की तरह बाहर फेंक िदया है।
सवालः रामिवलास ने भी तो अापके चाणक्य पऱोफेसर रंजन यादव को तोड़ िलया था।
जवाबः गये तो वहां,बाकी का हैिशयत रहा। हमरा साथ थे तो राज भोग रहे थे। वहां जाते कौड़ी के तीन हो गये।
सवालः यह अापके साथ क्या हो रहा है िक िजसे भी अाप चाणक्य का दजाॆ देते हैं,वह अापको ही पट्टी पढ़ाने लगता है?
जवाबः हम इशारा समझ गये। बाबा िशवानंद ितवारी को जहां चाभने के िलए िमलता है,वहां वे पसर जाते हैं। माउथ डायिरया की िशकायत पढ़ने के समय से उनको है। अटर-पटर बोल के समझते हैं िक बड़का नेता हो गये। अरे ऊ तो हम कुछ पुराना करजा उतार रहे थे,नहीं तो वे साथ में रखने लायक हैं का। अब नीतीश को पट्टी पढ़ा रहे हैं। उनको भी जल्दीये गिरयायेंगे। बस तेल और तेल की धार देखते चलो।
सवालः वे तो कहते हैं िक अापका भांडा फोड़ेंगे?
जवाबः कहते हैं,कर नहीं न रहे हैं। वे जानते हैं िक हम पोिलिटशयने खाली नहीं हैं। बुखार उतार देंगे। वे जानते हैं िक भंडा फोड़ने के नाम पर अंट-शंट गढें़गे,तो हम उनका कालेज से लेकर अब तक का कच्चा िचट्ठा खोल देंगे। िफर लाजे उ न तो घरे जायेंगे ना पटना में नजर अायेंगे। हिरद्वारे में िठकाना िमलेगा।
सवालः एेसा क्या कच्चा िचट्ठा है अापके पास?
जवाब ः नहीं,इ हम अॉफ दी िरकाडोॆ नहीं बोलेंगे। बात का बतंगड़ बन जाता है।

नोटः लंबे इंटरव्यू का अगला अंश जल्द ही।

Aug 17, 2008

सपने में िमले लालू

बीती रात सपने में लालू से टकरा गया। वे अपने अावास पर थे। एक कुसीॆ पर बैठ दूसरे पर पैर पसार खैनी मल रहे थे। कुछ टेंशन में लग रहे थे। रोज घेरे रहनेवाले चेहरे गायब थे। पूछा तो बोले-लाइफ में वाइफ से बड़ा टेंशन है भाई। मुझ खबरची को लगा िक कुछ एक्सक्लूिसव मामला है। तुरंत कागज-कलम िनकालने लगा। लालू भड़क गये। इ का करते हो। एको िमनट फुरसत में नहीं रहने दोगे का? अभी सरदार जी की कुसीॆ बचा के तनी फुरसत में अाये थे िक घुस अाये घर में। मामला िबगड़ता देख मैंने यू टनॆ िलया। कहा हम भी त यही मौका के तलाश में थे िक कब अाप फुरसत में िमले िक कुछ एने-अोने का बात हो। देखो भाई हम कुछ िछपाते तो नहीं हैं,बाकी िववादास्पद बात मत करना। कहीं कुछ लटपट मुंह से िनकल गया,तो अजबे-गजब हो जायेगा। मैनें उन्हें िदलासा िदया िक एेसी बातों को हम एिडट कर देंगे। वे नानुकुर के बाद ॆ तैयार हो गये बितयाने के िलए,लेिकन साफ कह िदया िक सब अॉफ दी िरकाडॆ होगा। हमारी बातचीत शुरू हुई।
सवालः अाप लाइफ में वाइफ से टेंशन के बारे में कुछ कह रहे थे?
जवाबः अा गये न िफर उलटा-सुलटा सवाल पर। अरे इहो कोई सवाल है। लाइप में वाइफे से न टेंशन होगा?
सवालः कइसा टेंशन?
जवाबः भारी बुरबक हो। सरदार जी की कुसीॆ बचाये हम अउर कुल कऱेिडट मुलायम-अमर ले उड़े त कोई वाइफ खुश होगी का?
सवालः अाप तो इतनी छोटी बात पर पिहले कभी टेंशिनयाते नजर नहीं अाये, इस बार काहे का टेंसन?
जवाबः सोिनया जी सब समझती हैं,जादा टेंशन नहीं है। मुलायम से तो हम पिहले से फिरयाते रहे हैं, बाकी उसका इ सलाहकार अमर का कुछ पता नहीं चलता। इहे असली टेंशंन है। सरदार जी की कुसीॆ बचाने में उ एतना खेल िकया िक हमरो टेंशन होने लगा। गजबे िदमाग चलता है उसका। वइसे हमहू लइकाइये से तोड़-फोड़ मास्टर रहे हैं, बाकी उ तो िपऱिसंपल िनकल गया। मूड़ीकटवा पाटीॆवाला सब उसको फंसाने का चाल चला, लेिकन उलटे उसी सब को कटघरे में खड़ा कर िदया। देखो अकबकी में अडवाणी जी भी घुलिटया गये हैं। उसका दस गो अादमी फोड़ िलया। तुम्हारी भाषा में अपना टीअारपी बढ़ा िलया।
सवालः अाप भी तो सरकार के खेवनहार माने जाते हैं?
जवाबः उ त हम हइये हैं। बाकी लेफ्टवाला सब मुलायम-अमर को मौका दे िदया। नहीं तो सब अरामे से चल रहा था। करात-येचुरी को तो हम खेला ही रहे थे। इ अमरवा एगो बौरो िखलाड़ी टीम में अा गया। इहे असली टेंशन है। वइसे सोिनया जी भी मौका देख चुप हैं, नहीं तो इ अमरवा कौनो कम लटपट बोलता था सोिनया मैडम को?
सवालः कैसे िनबटेंगे मुलायम-अमर जोड़ी से?
जवाबः इहे त असली टेंशन है भाई। एकरे पर िचंतन-मनन के िलए अकेले में खैनी खाकर फुरसत से बैठे थे िक तुम टपक गये।
सवालः असली बात,तो अाप बताये ही नहीं िक लाइफ में वाइफ से कैसे टेंशन है?
जवाबः सब एके बार पूछ लोगे िक कलहूं के िलए कुछ छोड़ोगे? कल अाना बतायेंगे। अॉफ दी िरकाडॆ का यही तो फायदा है िक बात कर मन भी हल्का हो जाता है अउर बात एेने-अोने होने का भी खतरा नहीं होता।
नोटः अगला इंटरव्यू जल्द ही।

Aug 14, 2008

कॉलेज में को-एजुकेशन-अंितम

माहौल गरमाते मम्मी-डैडीवाले लड़के कॉलेज छोड़ िदये
चुनाव पऱचार छोड़ सभी तमंचा जुगाड़ने में लगे थे
लड़िकयां गदहे की िसंग की तरह गायब हो गयीं थीं
बम फूटने लगे थे,तमंचे चमकने लगे थे
पटनिहया भारी पड़ रहे थे

कॉलेज जीवन के तीन साल में छातर संघ चुनाव का दूसरा अनुभव मुझे िमलनेवाला था। लड़के खुश थे। कारण था इस बहाने लड़िकयों से िमलने का मौका। यहां बताता चलूं िक कॉलेज के अिधकांश लड़के गऱामीण इलाके के थे। जो पटनिहया थे,उनमें से भी अिधकांश की जड़े गांवों में थी। चुनाव की दुंदुभी बजते ही कॉलेज का माहौल बदल गया था। इंटर के लड़के पहली बार चुनाव देख रहे थे,इसिलए वे कुछ ज्यादा ही उत्सािहत थे। जैसा िक मैने पहले के लेख में उल्लेख िकया है िक इस बार १९७७ के चेहरे गायब थे। १९८० का रंग भी अलग था। नवल िकशोर यादव के साथ पटना के पुनाइचक,अादमी गांव और िबरादरी के लोग लामबंद हो गये थे। नवल मेरे साथ साइक्लॉजी अॉनसॆ में थे। गजेन्दऱ िसंह और िजतेन्दऱ िसंह की एक ही जाित होने के कारण मामला उलझ गया था। दोनों के संपकीॆ उनके साथ हो िलये थे। अब यह लगने लगा था िक रामकृपाल यादव की तरह नवल भी चुनाव न जीत जाये। रामकृपाल के समय उनके करिबगिहया के साथी बॉिक्संग गलब्स पहन कर अाये थे। और भी बहुत से हिथयार चमके थे। यह बात इसबार के उम्मीदवारों के जेहन में थी।
चुनावी रणनीित बनने लगी थी। पऱचार पर कम जोर था। ज्यादा जोर बम और हिथयार के साथ अादमी जुगाड़ने पर था। नवल के मुहल्ले के लोग तमंचे और हॉकी िस्टक के साथ कॉलेज में घूमने लगे थे। पढ़ाकू लड़के (इन्हें मजाक में लड़के मम्मी-डैडीवाला बच्चा कह बुलाते थे)कॉलेज अाना लगभग बंद कर िदये थे। लड़िकयां भी गदहे के िसंग की तरह कैंपस से गायब हो गयीं थीं। कैंपस युद्ध मैदान बन गया था। तीन सेनापितयों के झंडे तले सैिनक लामबद्ध थे। एक दूसरे के खेमे में अपनी हैिशयत का संदेश इस या उस माध्यम से भेजा जाता था। अब तक पटना के नामी रंगबाजों से संपकॆ कर उनकी सेवा िमलने की सूचना से कैंपस में दहशत फैल चुकी थी। िस्थित यह थी िक कायर नहीं समझ िलये जाये,इसिलए डर के बाद भी लड़के कॉलेज अाना नहीं छोड़ पा रहे थे। पढ़ाई ठप हो चुकी थी और पऱोफेसरोंं की मौज थी।
जैसे-जैसे चुनाव की ितिथ नजदीक अाती जा रही थी तनाव और गहराता जा रहा था। नवल जीत की अोर थे। िजतेन्दऱ और गजेन्दऱ में से एक को बैठाने की कोिशशें शुरू हो चुकी थी। खांटी पटनिहया होने के कारण गजेन्दऱ भारी पड़े और िजतेन्दऱ को मैदान छोड़ना पड़ा। अब लड़ाई अामने-सामने की थी। मतदान के एक सप्ताह पहले से बम फोड़े जाने लगे। तेज अावाज और भगदड़ का यह िसलिसला चुनाव के िदन तब थमा जब दोनों पॐों के बीच पुिलस खड़ी कर दी गयी। तनाव और दहशत के माहौल में अल्प मतदान हुअा। गजेन्दऱ जीत गये। लेिकन अागे कोई अनहोनी न हो इसके िलए उन्हें रंगबाज लड़कों की टोली की सुरॐा लेनी पड़ी। नवल का गऱुप भी कुछ एेसी ही िस्थित में था। माहौल सामान्य होने में महीनों लगा। कॉलेज कैंपस पुरानी रंगत में लौटा। मम्मी-डैडी वाले लड़के भी िकताब-कॉपी के साथ नजर अाने लगे। लड़िकयां भी लौटीं। बहार अायी। (नवल राजद के िवधान पाषॆद होने के साथ गुरु गोिवंद िसंह कॉलेज,पटना िसटी में लेक्चरर भी हैं।

Aug 12, 2008

कॉलेज में को- एजुकेशन-१

कलम छूट जाती थी कंघी नहीं
लड़िकयों के कॉमन रूम के गोपन को अोपन करते लड़के
गड़बड़ िसंह हड़बड़ समाचार सुनाते पतरकार बन गये
रामकृपाल (वतॆमान सांसद)के अाते िवजय पतली गली से िनकल िलये

मैं सन् ७७ में स्कूल को बॉय-बॉय कर कॉलेज में गया। १६ साल का था। पटना के एएन कॉलेज में को-एजुकेशन से पहला सबाका था। लड़िकयों और लड़कों ने अपना-अपना गऱुप बना िलया था। कैंपस में हमलोग सहज नहीं थे। लड़िकयां क्या बितयाती थी,नहीं पता। लेिकन लड़को का गऱुप पढ़ाई की बात कभी-कभी ही करता था। हां सामने लड़िकयां हों,तो िसफॆ पढ़ाई की ही बात होती थी। लड़िकयां कॉलेज से गाहे ब गाहे अनुपिस्थत भले हो जाती थी,लेिकन लड़कों का अटेन्डेंस पूरा रहता था। हम अापस में चुहल करते-कलम भले घर में छूट जाये कंघी नहीं छूटनी चािहए। लड़के मनाते िक क्लास लीजर हो जाये। यही वो समय होता था जब लड़िकयों से िमलने-जुलने का संिॐप्त मौंका िमलता था। धीरे-धीरे लड़िकयां भी इसे समझ गयी। मंशा को भांप वे एेसी िस्थित में सीधे गल्सॆ कॉमन रूम में जाने लगीं। उनका कॉमन रूम भी कम रहस्मय नहीं था। दरवाजे पर एक दाई की ड्यूटी रहने के कारण भीतर का रहस्य और गहरा गया था। िजतने मुंह, उतनी बातें थी। लड़के अपनी-अपनी तरह से भीतर के गोपन को अोपन करते। कुछ लड़िकयां टेबुल टेिनस का शौक रखती थीं। इसके िलए उन्हें ब्वायज कॉमन रूम में जाना पड़ता था। उस समय कॉमन रूम में भीड़ हो जाती थी। पहले से टेबल टेिनस पर हाथ अजमा रहे लड़कों की चांदी हो गयी थी। लड़िकयों को िसखाने-बताने और उनके साथ खेलने से वे कॉलेज के अन्य लड़कों के बीच िवलेन बन गये थे। कई िकऱकेिटयर भी टेबल टेिनस खेलने लगे। बकझक भी शुरू हो गयी। मामला इंचाजॆ तक पहुंचा और कुछ लड़कों के कॉमन रूम में अाने से मना कर िदया गया। अािखर ईष्या की अाग धधकी और अोिरिजनल िखलाड़ी इस या उस बहाने टारगेट िकये जाने लगे। हद तो तब हो गयी जब उनकी िपटाई तक मामला जा पहुंचा। लड़कों के कॉमन रूम से लड़िकया कन्नी काटने लगीं। इसी के साथ लड़कों की रुिच भी खत्म होने लगी।
जाड़े का समय अा गया था। अाट्सॆ ब्लाक का अांगन धूप सेंकनेवालों से गुलजार रहने लगा। छातर संघ के चुनाव का िवगुल बज चुका था। हमारे सहपाठी िवजय िसंह अध्यॐ के उम्मीदवार बन गये थे। एक कांिबनेशनवाले हम सभी लड़के उनके िपछलग्गू बन गये थे। वे िसर पर बड़ी सी िटक रखते थे और बड़ी बात यह थी िक लड़िकयों से बात करने में घबराते नहीं थे। धूप सेंक रही लड़िकयों के पास वे बेधड़क पहुंच जाते और हम जैसे सािथयों के हुजूम के साथ सबसे पहले एक हाथ से अपनी लंबी िटक उठा शुरू हो जाते- यह बीबीसी लंदन है। अब अाप गड़बड़ िसंह से हड़बड़ समाचार सुिनये। वे सुनाते जाते। लड़के-लड़िकयां िखलिखलाते रहते। उनका यह अंदाज कॉलेज का नया शगल बन गया। लड़िकयों से वे बस इतना कहते अाप वोट देने के िलए हामी भर दीिजये,हम अापका वोट ले लेंगे। उनकी चुनावी घोषणा भी अजब-गजब थी। िसटी बस में मुफ्त सफर की उनकी घोषणा मतदान के पहले ही कंडक्टरों-डराइवरों से मारपीट के साथ बस सेवा बंद होने के रूप में सामने अाया। अब वे िसफॆ मसखरा ही नहीं दबंग भी बन गये थे।
चुनाव के िदन िपछले अध्यॐ रामकृपाल यादव (वतॆमान में राजद के सांसद)अपने गुगोॆ के साथ कॉलेज अाये और िवजय िसंह पतली गली से िनकल िलये। हंगामा हुअा और चुनाव रद्द हो गया। असेॆ बाद िवजय िसंह पटना रेलवे स्टेशन पर िमले। पता चला िक पतरकार बन गये हैं। अाज अखबार में कऱाइम िरपोिटॆंग कर रहे हैं।
बीए में गया, तो एक बार िफर छाॊ संघ चुनाव की तैयारी शुरू हो गयी। इस बार िवजय िसंह सीन से गायब थे। पुनाइचक मुहल्ले से अानेवाले नवलिकशोर यादव (वतॆमान में राजद के िवधान पाषॆद),बाबा बलराम के लड़के गजेन्दऱ िसंह और िवधायक उमाशंकर िसंह के लड़के िजतेन्दऱ िसंह (महराजगंज से िजतेन्दऱ स्वामी के नाम से संसदीय चुनाव लड़ चुके हैं और िफलवक्त िविभन्न मामलों में जेल में हैं)मैदान में थे।

Aug 11, 2008

१८ माचॆ १९७४ को पटना

पटना जल रहा था,दहशत का अालम था
ेसेकऱेटेिरएट और सचॆलाइट अखबार को फूंका
िवधायक भोला बाबू के घर के पास मारे गये लड़के
जयपऱकाश नारायण िगरफ्तार हो चुके थे
घर-घर बीबीसी बना िवश्वसनीय

अारब्लॉक का रोड नं.तीन । सुबह अाठ बजते-बजते लोगों से भर गया था। ये िवद्याथीॆ थे। गुरू जी थे जयपऱकाश नारायण। उन्हीं के बुलावे पर ये िवधानसभा घेरने अाये थे। िवधानसभा को हर तरफ से बैरेकेिटंग कर िदया गया था। डंडों और रायफलों से लैस खाकी वदीवाले भी मुस्तैद थे। पूरे वातावरण में एक अजीब सी दहशत थी। बड़े-बुजुगॆ कह रहे थे,इन छोकड़ों का क्या भरोसा कहीं कुछ अनहोनी न कर बैठें। मैं टूटा पांव िलये घर के गेट के पास बैठा सब देख-सुन रहा था। दस बजे गोली चलने जैसी अावाज अाने लगी। भगदड़ मच गयी। लड़के भागते,िफर जुट जाते। पता चला िक टीयर गैस छोड़ने की अावाजें थीं। पुिलस की नौकरी बजानेवाले मेंरे चाचा जी ने नल से पाइप जोड़ गेट के बाहर रख िदया। लड़कों का हुजूम अांख धोने लगा। यह िसलिसला चल ही रहा था िक एक बार िफर गोिलयों की अावाज अाने लगी। इस बार वह अावाज काफी नजदीक लग रही थी। भीड़ छंटने लगी और देखते-देखते सड़क खाली हो गयी। िजतने मुंह उतनी बातें होने लगी। पता चला िक रोड नं.छह में िवधायक भोला बाबू के घर के पास चार लड़कों को गोली लगी है। बेली रोड में भी गोली चलने की बात सामने अायी। दोपहर होते-होते बस एक ही सूचना हर तरफ से अा रही थी,एक दजॆन लड़के मारे गये हैं। तभी सूचना अायी िक िबना बांउंडॆी वाले िवधानसभा और सेकऱेटेिरएट को फूंक िदया गया है। सचॆलाइट अखबार में भी अाग लगायी गयी है। कुछ जगहों पर दुकानों में तोड़-फोड़ और लूट की बात भी सुनने को िमली। चाचा जी ने शाम होते ही सभी को घर के भीतर रहने की िहदायत देकर दरवाजा बंद कर िदया। शाम साढ़े सात बजे रेिडयो से पऱादेिशक समाचार सुनने को सभी बेचैन थे। वो घड़ी भी अायी। अांदोलन की घटनाअों से जुड़ी खबर िनराश करनेवाली थी। िजतना हल्ला था,उसका थोड़ा सा भी उल्लेख खबर में नहीं थी। िफर बीबीसी लगाया गया। पटना जल रहा है की खबर से लगा िक िदनभर सुनी-देखी बातों में दम है। हालांिक उसमें भी मरने और घायल होनेवाले की संख्या हमारी सूचना से मेल नहीं खा रहे थे। बस अगलगी की घटनाअों की पुिष्ट हुई। बीबीसी से ही पता चला िक हजारों लोगों को िगरफ्तार िकया गया है। जयपऱकाश नारायण का िसर पुिलस की लाठी से फूट गया है। अब हमें इंतजार था िक कल क्या होगा?

Aug 10, 2008

पटना में बीता बचपन

बगलगीर बने सीएम हिरहर िसंह
१९७४ का नारा था हाथ में लबनी,मुंह में ....
िमल्लर स्कूल में पता चला िक लालू बड़का हीरो बन गया है
इअारब्लॉक मुहल्लाः पूरे पऱदेश का पऱितिनिधत्व

मेरा बचपन पटना में बीता। सात साल का था,तो अार ब्लॉक मुहल्ले में रहने अा गया। बड़े अहाते के बीच घर में रहने का पहला मौका था। छुटपन रोज इंकलाबी नारों को सुनते और जुलूस की भीड़ को देखते गुजरने लगा। मेरा घर अार ब्लॉक के रोड नं तीन में था। यह सड़क एक अोर सीधे िवधानसभा और पुराना सिचवालय जाती थी। सड़क का दूसरा िसरा सरपेॆटाइन रोड से जुड़ता था। मुहल्ले ंमें हर रोड में एक मैदान। खेलने-कूदने का पूरा इंतजाम। हर पांच साल में और कभी-कभी बीच में भी मुहल्ले में नयापन अा जाता था। यह सब िवधानसभा में हारने-जीतनेवाले चेहरे करते थे। राज्य के हर कोने की भाषा और तहजीब यहां एक जगह देखने का भी अवसर था। चौथा क्लास में था तब पहली बार लगा िक मैं िवशेष जगह रहता हूं। इसी साल बगल में रहनेवाले सरदार हिरहर िसंह सीएम बने थे। गहमा-गहमी का अालम था। स्टीट लाइटें जगमग हो गयीं थीं। टूटी सड़क िहचकोले न दे इसके िलए गंगा का बालू पूरी सड़क पर चादर की तरह िबछा िदया गया था। सायरन बजाती गािड़यां अजीब उत्तेजना से भर देती थीं। उनके घर के सामने टेंट लग गया था। छुरावाला रायफल लेकर संतरी हमेशा मुस्तैद रहता था,लेिकन उनके घर के भीतर अाने-जाने पर कोई टोका-टोकी नहीं करता था। एक िदन उनके घर के पास कोलाहल हो रहा था। पता चला िक सरदार साहब भड़के हुए हैं। कारण था उनके गांव के बाबू तेज पऱताप िसंह का िकसी बात पर गरम होना। धीरे-धीरे बात फैली, तो पता चला िक तेज पऱताप बाबू िवधानसभा की कारॆवाही देखने गये थे। साथ में नौकर झुनझुन भी उनका चांदी का पानी पीने का कटोरा और छाता लेकर गया था। उनका छाता-कटोरा िवधानसभा के माशॆलों ने बाहर ही रखवा िलया था। यह बात तेज पऱताप बाबू को लग गयी थी और वे इसे लेकर गांव के नाते में अपने भतीजे सरदार साहब पर भड़के हुए थे। सरदार साहब उन्हें व्यवस्था का हवाला देकर समझाने की कोिशश कर रहे थे और वे उनके सीएम होने के रुतबा का हवाला देकर इसे मानहािन बता रहे थे। बात अायी-गयी हो गयी, लेिकन असेॆ तक इसपर चचाॆ चलती रही।
सातवां पास करने के बाद िमलर हाइस्कूल में चला गया। १९७४ का छाॊ अांदोलन रंग पकड़ रहा था। पता चला िक हमारे ही स्कूल के छाॊ रहे लालू यादव पटना यूिनविसॆटी का बड़का हीरो बन गया है। जोर-शोर के चक्कर में इंकलाब हमारा नारा है सुनते-सुनते कभी जुबान पर चढ़ गया था। अब हम सभी लड़के जोर-जोर से नारे लगाने लगे थे-हाथ में लबनी,मुंह में पान,गफूर िमयां की यही पहचान। रोज मशाल जुलूस िनकलता और यह नारा लगता। इसी साल माचॆ में गांव गया और खिलहान में फुटबॉल खेलते पांव टूट गया। लाद-फाद कर पटना लाया गया। पैर पर प्लास्टर चढ़ा और िमल गयी बैशाखी।
१८ माचॆ के ठीक दो िदन पहले यह सब हुअा था। १८ को अहले सुबह से ही अारब्लॉक के रोड नं.तीन में गहमा-गहमी शुरू हो गयी थी।

िबजी रहने का नया लाइन िमल गया

तो फुरसत में भी िबजी रहने का नया लाइन िमल गया है। कितपय नजदीकी असेॆ से ब्लािगस्ट बने हुए हैं। इसे लेकर तरह-तरह की बतकही भी करते हैं। मैं मूक श्रोता बन सुनता-गुनता रहा हूं। हरेक ने अपने ब्लाग का नाम अपने तरीके से रखा है। अजब-गजब नामों का यह खेल मेरी समझ में कभी नहीं अाया। शायद कुछ नया लगे इसका ही उसमें अागऱह होगा।
जब मैंने अपना ब्लाग लाने को सोचा,तो नाम के घनचक्कर में उलझ गया। कुछ लोगों ने नाम भी सुझाया। अटपटे नामों से पीछा छुड़ा फुरसत में मनन कर नाम रखा फुरसत में। तय है िलखूंगा भी फुरसत में ही और फुरसत में ही िटप्पणी भेजनेवालों को जवाब भी दूंगा। अभी फुरसत नहीं है,संभव है एक दो िदन में इसके िलए फुरसत िनकाल लूं। तब तक के िलए बॉय-बॉय।