बगलगीर बने सीएम हिरहर िसंह
१९७४ का नारा था हाथ में लबनी,मुंह में ....
िमल्लर स्कूल में पता चला िक लालू बड़का हीरो बन गया है
इअारब्लॉक मुहल्लाः पूरे पऱदेश का पऱितिनिधत्व
मेरा बचपन पटना में बीता। सात साल का था,तो अार ब्लॉक मुहल्ले में रहने अा गया। बड़े अहाते के बीच घर में रहने का पहला मौका था। छुटपन रोज इंकलाबी नारों को सुनते और जुलूस की भीड़ को देखते गुजरने लगा। मेरा घर अार ब्लॉक के रोड नं तीन में था। यह सड़क एक अोर सीधे िवधानसभा और पुराना सिचवालय जाती थी। सड़क का दूसरा िसरा सरपेॆटाइन रोड से जुड़ता था। मुहल्ले ंमें हर रोड में एक मैदान। खेलने-कूदने का पूरा इंतजाम। हर पांच साल में और कभी-कभी बीच में भी मुहल्ले में नयापन अा जाता था। यह सब िवधानसभा में हारने-जीतनेवाले चेहरे करते थे। राज्य के हर कोने की भाषा और तहजीब यहां एक जगह देखने का भी अवसर था। चौथा क्लास में था तब पहली बार लगा िक मैं िवशेष जगह रहता हूं। इसी साल बगल में रहनेवाले सरदार हिरहर िसंह सीएम बने थे। गहमा-गहमी का अालम था। स्टीट लाइटें जगमग हो गयीं थीं। टूटी सड़क िहचकोले न दे इसके िलए गंगा का बालू पूरी सड़क पर चादर की तरह िबछा िदया गया था। सायरन बजाती गािड़यां अजीब उत्तेजना से भर देती थीं। उनके घर के सामने टेंट लग गया था। छुरावाला रायफल लेकर संतरी हमेशा मुस्तैद रहता था,लेिकन उनके घर के भीतर अाने-जाने पर कोई टोका-टोकी नहीं करता था। एक िदन उनके घर के पास कोलाहल हो रहा था। पता चला िक सरदार साहब भड़के हुए हैं। कारण था उनके गांव के बाबू तेज पऱताप िसंह का िकसी बात पर गरम होना। धीरे-धीरे बात फैली, तो पता चला िक तेज पऱताप बाबू िवधानसभा की कारॆवाही देखने गये थे। साथ में नौकर झुनझुन भी उनका चांदी का पानी पीने का कटोरा और छाता लेकर गया था। उनका छाता-कटोरा िवधानसभा के माशॆलों ने बाहर ही रखवा िलया था। यह बात तेज पऱताप बाबू को लग गयी थी और वे इसे लेकर गांव के नाते में अपने भतीजे सरदार साहब पर भड़के हुए थे। सरदार साहब उन्हें व्यवस्था का हवाला देकर समझाने की कोिशश कर रहे थे और वे उनके सीएम होने के रुतबा का हवाला देकर इसे मानहािन बता रहे थे। बात अायी-गयी हो गयी, लेिकन असेॆ तक इसपर चचाॆ चलती रही।
सातवां पास करने के बाद िमलर हाइस्कूल में चला गया। १९७४ का छाॊ अांदोलन रंग पकड़ रहा था। पता चला िक हमारे ही स्कूल के छाॊ रहे लालू यादव पटना यूिनविसॆटी का बड़का हीरो बन गया है। जोर-शोर के चक्कर में इंकलाब हमारा नारा है सुनते-सुनते कभी जुबान पर चढ़ गया था। अब हम सभी लड़के जोर-जोर से नारे लगाने लगे थे-हाथ में लबनी,मुंह में पान,गफूर िमयां की यही पहचान। रोज मशाल जुलूस िनकलता और यह नारा लगता। इसी साल माचॆ में गांव गया और खिलहान में फुटबॉल खेलते पांव टूट गया। लाद-फाद कर पटना लाया गया। पैर पर प्लास्टर चढ़ा और िमल गयी बैशाखी।
१८ माचॆ के ठीक दो िदन पहले यह सब हुअा था। १८ को अहले सुबह से ही अारब्लॉक के रोड नं.तीन में गहमा-गहमी शुरू हो गयी थी।
Aug 10, 2008
िबजी रहने का नया लाइन िमल गया
तो फुरसत में भी िबजी रहने का नया लाइन िमल गया है। कितपय नजदीकी असेॆ से ब्लािगस्ट बने हुए हैं। इसे लेकर तरह-तरह की बतकही भी करते हैं। मैं मूक श्रोता बन सुनता-गुनता रहा हूं। हरेक ने अपने ब्लाग का नाम अपने तरीके से रखा है। अजब-गजब नामों का यह खेल मेरी समझ में कभी नहीं अाया। शायद कुछ नया लगे इसका ही उसमें अागऱह होगा।
जब मैंने अपना ब्लाग लाने को सोचा,तो नाम के घनचक्कर में उलझ गया। कुछ लोगों ने नाम भी सुझाया। अटपटे नामों से पीछा छुड़ा फुरसत में मनन कर नाम रखा फुरसत में। तय है िलखूंगा भी फुरसत में ही और फुरसत में ही िटप्पणी भेजनेवालों को जवाब भी दूंगा। अभी फुरसत नहीं है,संभव है एक दो िदन में इसके िलए फुरसत िनकाल लूं। तब तक के िलए बॉय-बॉय।
जब मैंने अपना ब्लाग लाने को सोचा,तो नाम के घनचक्कर में उलझ गया। कुछ लोगों ने नाम भी सुझाया। अटपटे नामों से पीछा छुड़ा फुरसत में मनन कर नाम रखा फुरसत में। तय है िलखूंगा भी फुरसत में ही और फुरसत में ही िटप्पणी भेजनेवालों को जवाब भी दूंगा। अभी फुरसत नहीं है,संभव है एक दो िदन में इसके िलए फुरसत िनकाल लूं। तब तक के िलए बॉय-बॉय।
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